विस्मृत शब्दक मादे विमर्श : प्रयोग आ प्रासंगिकता
______________________________________
![]() |
| लेखक -: विकाश वत्सनाभ जी |
वस्तुतः ओ विस्मृत शब्द सभ जड़ि थिक। जड़ि दिस देखबाक प्रवृत्ति अपन अस्मिता केँ अखण्ड रखबाक पहिलुक ओरिआओन होइत अछि । एहन शब्द सभ मैथिलीक अपन बासनक रान्हल मधुरगर पाक अछि जकर प्रकृति आ उत्पत्ति मिथिला-मैथिली संस्कार आ संस्कृति से भेल अछि। एहि मे आत्मीयता आ भाषाक सुवास छैक। वस्तु, स्थान आ परिवेश केँ ओकर नैसर्गिक रूप मे आत्मसात करएबाक सहजता छैक।
ओ शब्द सभ पुरान घरक सूचक सँ बेसी नव घर मे ओहि स्मृति केँ जोगा कए रखबाक एकटा उद्योग छैक जतय ओ आब अनभुआर सन 'फील' करैत अछि। प्रत्येक भाषाक शब्दक अपन एकटा विशिष्ट संस्कृति होइत छैक। एहि संस्कृति मे समयानुकूल परिवर्तन सेहो होइत छैक। आन भाषा सँ पैंच-उधार चलैत रहैत छैक। भाषा केँ जिबैत रहबाक लेल ओकरा अपन बाउंड्री मे किछु स्पेस तँ अवस्से दोसर भाषा केँ देबाक चाही जाहि सँ ओ समीचीन आ प्रासंगिक बनल रहए। अनेक तरहक वैश्विक परिवर्तन केँ आत्मसात कए सकए। मुदा एहि अधिकारक विस्तार एतेक नहि विस्तृत हुए जे आगंतुक चासे हरैप लैथ। अल्ट्रामोडर्न हाउस मे अतिप्राचीन पेंटिग टाँगब एखनहुँ प्रासंगिक अछि आ ताहि हेतु ओकर स्पेस पहिनहि सँ ओहिठाम निर्धारित कएल जाइत छैक ।
ओ शब्द सभ हराएल नहि अछि । विस्मृत भए रहल अछि । हमर अनुभव अछि जे एहि शब्द सभक प्रयोग सँ पाठक केँ कोनो एक्स्ट्रा लोड नहि लेबए पड़ैत छनि आ ओ सहजहि फ्लैशबैक मे ओहि शब्द सँ आत्मीयता स्थापित करैत छथि। हुनका रुचिकर लगैत छनि। कुंभक मेला मे हेराएल कोनो समांग जँ केलिफोर्निया मे भेटैथ तँ कतेक आह्लादित होएब तकर आकलन कए सकैत छी।
शब्दक एकटा पृथक ओजन होइत छैक जे रचना मे ओकर कथ्य केँ विस्तार दैत छैक आ ओकरा प्रभावकारी बनबैत छैक। कवि विद्यानंद झाक एकगोट कविता छनि : बैगनी रंगक ई बूसट। एहिठाम बूसट केँ शर्ट अथवा आओर कोनो तेहन शब्द लिखल जाए सकैत छल। मुदा कि ओकर ओजन ओएह होइतैक ? वस्तुतः शब्दक चयन कविता मे निहित पात्र आ ओकर चरित्र पर निर्भर करैत छैक ।
हँ, कविक ई दायित्य अवस्से जे ओहि पुरान शब्दावली केँ एखुनका समय केँ वस्तुस्थिति सँ जोड़ि ओकरा बोधगम्य बनबैथ। लोकल शब्दक ट्रीटमेंट सँ ग्लोबल बोध करेनिहार एहि साहित्य मे कवि भेलाह अछि। एखनहुँ छथि । आदरणीय कवि नारायण जी, धनखेती मे बोझ पर पीठि टिका वैश्विक कविता लिखैत छथि।
मैथिलीक शब्द संपदा विपुल अछि। मुदा से आब अनभुआर भेल जाए रहल अछि। एकर मूल कारण थिक पढ़बाक स्पृहा मे कमी आ लोकक गाम सँ कटैत संबंध। बौआ जँ नकसी लगा भाँटा तोड़ैत छथि तँ ताहि मे बौआक कोन दोख ? एहन मे ओहि शब्द संपदा केँ जोगा कए रखबाक काज सहित्यजीवी कए सकैत छथि। हेराएल शब्दक प्रयोग एहिठाम एहि जिम्मेवारिक संग होएबाक चाही जे संपदा सेहो अनामति रहय आ रचनाक सम्प्रेषणीयता सेहो बाँचल रहए । यात्रीजीक एकटा कविताक किछु पाँती एहि विमर्श केँ आओर फ़रिच्छ कए सकैत अछि : माथ पर उत्तुंग खोपा/तपोवानी स्टाइल मे बान्हल/आ' ताहिमे लपेटल चम्पा फूलक माला/ गए नुनु! / ककर ककर प्राण लेबही तों आइ ?
जँ मौलिक शब्द, कविताक शिल्प आ समकालीन संसारक बोध हुए तँ हमरा जनैत ई प्रयोग एकटा बेहतरीन कॉम्बो भए सकैत अछि ओहिना जेना फुलहा थारी मे कोनो एग्जॉटिक इटैलियन भोजन परसल हुए ।
- विकाश वत्सनाभ

